वो नहीं है इसका गम न हो

वो थी ये वजह शुक्रगुज़ार होने को क्या कम है ?

दुनिया से पर्दा रोशनियों का बुझना तो नहीं

क्योंकि चिराग तो यूँ बुझाया गया है

कि सुबह होने को है।

~ रविंद्रनाथ टैगोर

Wednesday, 10 May 2017

सरकारी बाबू!

एक दफ्तर है जहाँ फाइलों ने सारी जगह घेर रखी है,बाकी जो जगह बची है उसे टेबल कुर्सी ने कब्ज़े में कर रखा है। पंखे के चलने की रफ़्तार हमारे सरकारी बाबू के काम करने की रफ़्तार से भी ज़्यादा सुस्त है।सरकारी बाबू ने एक कूलर लगा रखा है। उस कूलर की आवाज़ इतनी है की आम आदमी की आवाज़ नहीं सुनाई देती। सरकारी बाबू सुबह आते ही मुँह में खैनी गुटका दबा लेते है। मुँह खोलते है तोह शब्द कम लाल रंग की पिचकारी ज़्यादा निकलती है और गलती से अगर कोई काम जाये तोह उनके चेहरे से ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी ने साक्षात हिमालय उठाने को बोला हो!

अगर आप इन्हें ध्यान से देखे तोह आपको इनमे आलस का देवता नजर आएगा! जब देवता है तोह भक्त भी होंगे! भक्त है तोह, चढ़ावा भी होगा। अलग अलग देवताओ के लिए अलग अलग चढ़ावा! इन सब आलस के देवताओ को गाँधी जी की फोटू बेहद पसंद आती है। गाँधी जी की फोटू देखते ही ये देवता प्रसन्न हो जाते है। और झट से अपने भक्तों की सारी मनोकामनाये पूरी कर देते है।
 
यूं तोह आलस्य के मंदिर के बंद होने का समय सांय 5 बजे है, परंतु देवतागढ़ 15 मिनट पहले ही गायब हो  जाते है। यहाँ 5 बजे के बाद 1 सेकंड भी रुकना घोर पाप समझा जाता है। समय के बड़े पाबन्द है हमारे पूज्यनीय देवतागढ़!वो बात अलग है कि सुबह प्रकट होने में समय लगता है। अरे देबताओं का भी अपना ईमान धर्म होता है जी! आलस्य के मंदिर में आलस नहीं करेंगे तो कल से भक्त लोग भी चढ़ावा देना बंद कर देंगे।
 
कल को अगर देवता लोग चुनाव में खड़े हो गए तो उनका चुनाव चिह्व होगा "तोंद्" ये इन्हें गाँधी जी की फोटू के साथ मुफ्त में मिला है! जितने सीनियर देवता उतनी ज़्यादा तोंद्। ये तोंद् इनकी शान है। मंदिर में चढ़ाया हुआ सारा प्रसाद इसी गुल्लक में जमा होता है।जब वह अपने सिंघासन पे बैठ कर इस गुल्लक पर हाथ फेरते है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो उन्हें संसार का परम सुख प्राप्त हो गया हो। वे इतने मग्न हो जाते है कि स्वयं अप्सरा प्रकट हो जाये तो भी उनका ध्यान भंग नहीं कर सकती।

ऐसे देवताओं को मेरा सत-सत प्रणाम!
जय बाबू! जय सरकार!
जय हिन्द!

Friday, 17 February 2017

ख्वाहिशें!

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी के हर ख्वाहिश पे दम निकले
 बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले 

   

ख्वाहिशें,
हज़ारो लाखों ख्वाहिशें,
पल पल बदलती ख्वाहिशें,
वेवजह सी नादान ख्वाहिशें है!

कितनो को गले लगाकर सोता,
कुछ को धोखे से सुलाता हूँ

कितनो को पास बिठाता,
कुछ को बस टहलाता हूँ ,

कितनो को खूबसूरत सा खुद बनाता,
कुछ को खूबसूरत होने का एहसास भर दिलाता हूँ,

कितनो को जी भर चूमता,
कुछ के करीब होठ बस लाता हूँ

न जाने कितनो का खून करता
कितनो को दफनाता हूँ
ले देकर मैं कुछ का ही साथ निभा पता हूँ!


Photograph: clicked at Orchha,Madhya Pradesh,India


Tuesday, 14 February 2017

वैलेंटाइन डे वाली कविता!



  इतनी दूर से, 
तुम्हारा चेहरा,
साफ़ दिखाई नहीं देता,

ज़रा आओ तो निगाहों में,
आँखों से तुम्हारा दीदार करूँ,

ज़रा और करीब आओ,
तुम्हारा स्पर्श करूँ,
तुम्हारी कोमलता को गले लगा लूँ,

इतने करीब होने का ये एहसास,
 तुमसे ज़्यादा खूबसूरत होने लगा है,

ज़रा आओ,
दिल के इस मैदान में, 
तुम्हारे साथ प्यार का खूबसूरत खेल खेलूं!

ज़रा आओ,
पतझड हो,
पत्तों सी बिछ जाओ,
और मैं हवा सा तुम्हे उडा ले जाऊँ,

ज़रा आओ,
भूल भुलैया सी,
और मैं बस खो जाऊँ तुझमे,

ज़रा आओ,
परियों की दुनिया छोड़कर,
हक़ीक़त हो,
और मैं तुम्हारे करीब, बेहद करीब!

Photograph: clicked at Orchha,Madhya Pradesh,India

Friday, 3 February 2017

स्टेशन

ट्रैन आ रहीं है,
ट्रैन जा रहीं है,
यात्री सवार हो रहे है,
कुछ यात्री उतर  रहे है,

मगर कुछ ऐसे भी लोग है,
जिनका स्टेशन ही बसेरा है

लेटे बैठे सर्द रात गुज़ार रहे है,
अपनी किसी ट्रैन का न जाने कबसे इंतज़ार है,
शायद ट्रैन कोहरे की वजह से रद्द कर दी गयी है!

ठंड लगातार बढ़ रही है,
पेट लगातार धस रहा है,
साँस लगातार कम् हो रही है,
हाठ-मांस काँप रहा है,
पेट को पैरों से ढककर चादर बना ली गयी है।

न जाने ये रात कैसे गुज़रेगी,
न जाने वो ट्रैन कब आएगी,

वो अपनी ट्रैन का इंतज़ार कर रहे है,
मैं अपनी ट्रैन का इंतज़ार कर रहा हूँ,

वो मुझे देख रहे है,
मैं उन्हें देख रहा हूँ,
उनकी आवाज़ गूंगी हो गयी है,
मेरे कान बहरे हो गए है!



Saturday, 21 January 2017

मुसाफिर!


चलता मुसाफिर
चलता रहेगा 

शाम होगी
सूरज ढलता रहेगा
फिर होगा सवेरा
मुसाफिर बढ़ता रहेगा

चलना मुसाफिर 
चलना ही तो है
गिरना मुसाफिर
संभलना ही तो है

अब हम भला कहे क्या तुमको
मंज़िल की कब परवाह थी हमको
हम है मुसाफिर
राहे ही मंज़िल
राहों में हमको भटकना ही  तो है

अरे मुसाफिर
थोड़ी थी धूप थोड़ा था छाव
थोड़े थे पैरो में छाले
थोड़े थे आँखों में सपने
थोड़ी सी ज़िद्द थी थोड़ा सा लड़कपन
और थोड़े से हम
वो थोड़े से तुम
मुसाफिर!


Photograph: clicked at Dhurwa Dam,Ranchi,India

Friday, 21 October 2016

खोज



एक कविता खोज रहा हूँ,


मेहबूबा का रूठना हो,
आशिक की जिद् हो।          

दोस्ती की महक हो,
प्यार का एहसास हो।

सूरज सा तेज हो,
चाँद सा धैर्य हो।

जो थोड़ी चटपटी हो,
शक्कर सी मीठी हो,
खाने में बड़ी ही स्वादिष्ट हो,

धोनी के छक्के हो,
गूलजार सी लिखावट हो,
अभिताभ का अभिनय हो,

जो मेरे अंदर ही है कहीं
उसे बाहर में खोज रहा हूँ।

मैं एक कविता खोज रहा हूँ।







उड़ता पंछी करे कमाल!

उड़ता पंछी करे कमाल,
उड़ते उड़ते उड़ता जाये,
उड़ते उड़ते गाने गाये
उड़ते उड़ते जीना सीखे,
उड़ते करता लाखों बवाल,
उड़ता पंछी करे कमाल।


चाहे जिस डाली पे बैठे,
बैठे बैठे नज़ारे देखे हज़ार
इसपे किसी की रोक नहीं,
आज़ादी है इसकी दुकान,
उड़ता पंछी करे कमाल।

आसमाँ में बसती देखो उसकी जान,
उड़ना ही है बस एक पहचान,
नेचर से है प्रेम लड़ाये,
करतब अपने सबको दिखाये,
अपनी ही धुन में देखो ये है सवार,
उड़ता पंछी करे कमाल ।

कैद क्यों हो?
पिंजरे से निकलो,
ख्वाबो के तुम पंख ले लो,
मेरी मानो तुम भी उड़ लो,
उड़ने में ही मज़ा।

उड़ते उड़ते मौज मानाओ
उड़ते उड़ते जीलो गाओ
उड़ते उड़ते उड़ते जाओ
उड़ता पंछी करे कमाल।










लो आज मैं खडी हूँ तुम्हारे सामने,
खामोश सा चेहरा लिए,
मैं खडी हूँ तुम्हारे सामने,
आओ और मुझे चीर दो, फाड् दो,
टुकडे कर  दो मेरे,
मेरे जिस्म के हर एक अंग का लुफ्त उठाओ,
मेरे बालों को पकड़ो और घसीट दो जमीन पे,
और लगाओ तमाचे गालों पे,
कूटों, पीटो और मारो जब तक तुम थक नहीं जाते।
जब थक जाओ तो बता देना,
मैं बालों को सवार कर, मरहम पट्टी कर,
फिर खड़ी हो जाउंगी!
ताकि तुम फिर मर्द बन सको !!

सुनो सजनिया।

सुनो सजनिया,
दिल की बातें दिल ही जाने,
पर हम तो तुम पे मर गए,

सुनो सजनिया
मिलके तुमसे ,
हम तो बावरे हो गए,

चेहरा तेरा जैसे कोई नूर हो,
हम तो देखते ही रह गए,

बातें तेरी है समंदर ,
जिसमे हम तो डूब गए,

सुनो सजनिया
हमरे बगल में बैठ लो,
हाथ थामो,
थोडा हमको चूम लो।

तेरी ज़ुल्फो के साये मे,
ज़िन्दगी ये काट दूं,

आँखें तेरी है नशीली,
जाम आंसू के हमको बाँट दो,

सुनो सजनिया,
अरे!
सुनो सजनिया।










Monday, 15 August 2016

The writer wants to write!

एक विचार,फिर दूसरा विचार
पहला अपनी प्रस्तुती दर्ज कराना चाहता,
दूसरा भी अपना वज़न दिखाने की कोशिश करता,
इन विचारो का आपस में इतना मतभेद,
कि कोई भी पीछे नहीं हटता।

मेरी लिखावट अधूरी रह जाती
इन विचारो के चक्कर में।

विचारो के मतभेद को जैसे तैसे शांत किया,
एक विचार की टांग पकड़कर उसे डायरी में डाला,

तो शब्द उछल उछल कर अपनी दावेदारी पेश करने लगे,
शब्दो की इस भीड़ में कुछ को चुनना बेहद मुश्किल,
एक को न्यौता दो,तो दूसरा रूठ जाता
तीसरे का दामन पकड़ो तो पहला कभी वापस न आने की धमकी देता।

मेरी लिखावट अक्सर अधूरी रह जाती
इन शब्दो के चक्कर में।



Saturday, 6 August 2016

लाल सिग्नल

सिग्नल पे कुछ सामान बेचते हुए बच्चे ,
अक्सर मुझे मेरी बेबसी का एहसास दिलाते है,
बहुत लाचार सा महसूस करता हूँ !
वो बच्चे उम्मीदों की निग़ाहों से मुझे देखते,
कहने को तो सिर्फ पेन या पेंसिल बेच रहे होते,
पर उनकी आँखों मुझसे कुछ और ही कहती,
गाडी का शीशा खोल, पर्स में से दस रूपये का नोट निकाल उन्हें थमा देता हूँ !
सिग्नल हरा हो जाता है ,गाडी आगे बढ़ जाती है
आजकल वक़्त ही कहाँ है हमारे पास, ऐसे सिग्नल पे रुकने का!!
बस उन्ही से खरीदे हुए पेन से ये कविता लिख दी या फिर मेरी लाचारी|

Sunday, 26 June 2016

जहाँ कहीं भी हो जिन्दगी

आओ थोडा वक़्त निकाले,
जहाँ कहीं भी हो ज़िन्दगी,
उसको मिलकर खोजे।

आओ थोडा मिलकर खेले,
जहाँ कहीं भी हो ज़िन्दगी,
उसको थप्पा पेले।

आओ बंद दरवाज़े फिर से खोले,
जहाँ कहीं भी हो ज़िन्दगी,
उसे बिस्तर बनाकर सोले।

आओ थोडा आज झूमे,
जहाँ कहीं भी हो ज़िदंगी,
उसे गले लगाकर चूमे।

आओ भूली बिसरी गलियों में थोडा भटके,
जहाँ कहीं भी हो ज़िन्दगी,
उसे हाथ खोलकर लपके।

आओ दिल में उमंगें नयी भर ले,
जहाँ कहीं भी हो ज़िन्दगी,
उससे मोहब्बत करले।। || 

एक कोना

एक कोना जो बेहद पसंद है मुझे,
वहां हँसने की आज़ादी है,
रोने का भी इंतज़ाम है,
गुस्सा होने और नाराज़ होने पे भी कोई रोक टोक नहीं।

एक कोना,
जहाँ घंटो गुज़ारना पसंद है मुझे,
खुलकर लिखने,गाने की आज़ादी है,
कुछ अपना सा लगता है यहाँ!

मेरी भिखरी पड़ी किताबे, डायरी भी
इस कोने से गुफ्तगू करने लगी है।
ये तकिया जो इस कोने की सबसे अच्छी दोस्त है,
उस पर सर रखकर चैन की नींद सो जाता हूँ ।

डर है कि कोई सफाई वाला न आ जाये,
जो इस कोने की सफाई कर दे,
ये कोना पहले जैसा नहीं रहेगा,
बिखरा,गन्दा,फैला, बिलकुल मेरे जैसा।

डर है की ये कोना मुझसे दूर न हो जाये!