वो नहीं है इसका गम न हो

वो थी ये वजह शुक्रगुज़ार होने को क्या कम है ?

दुनिया से पर्दा रोशनियों का बुझना तो नहीं

क्योंकि चिराग तो यूँ बुझाया गया है

कि सुबह होने को है।

~ रविंद्रनाथ टैगोर

Sunday, 3 September 2017

खून!


कलम
कागज़
और खुद को लेकर बैठा
लिखने एक कविता

मन की गलियों में भटका
और झाँका दिल के भीतर

दिल में मिली कुछ ख्वाहिशे
और मन में थोड़ा सा तजुर्बा

मीठे-मीठे लफ्ज़ों से ख्वाहिशों को लिखा
 तजुर्बों के लफ्ज़ थे ज़रा से तीखे

मीठे लफ्ज़ों ने तीखो को ललकारा
 बहस हई जबरदस्त
खिंच गयी विभाजन की रेखा

नहीं चाहता था वक़्त गवाना
किसी को लुभाने
और किसी को मनाने में

इसलिए तीखें-मीठे लफ्ज़ों को गोली मारी
और खून से सने अपने हाथों को धोकर
फेंक दी कविता अधूरी!


एक कविता के खून का इल्जाम है मुझ पर! जाँच-पड़ताल हो सकती है। फिर पाठको की पंचायत में फैसला होगा। कुछ समय लिखने पर भी प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है । और हो सकता है तन्हाई की जेल में आजीवन कारावास की सजा सुना दी जाये। 
अगर ऐसा हुआ तो बचाव पक्ष कवियों की महफ़िल में सजा कम कराने की अपील करेगा 
                               धन्यबाद!



Photograph:- Internet

Sunday, 27 August 2017

याद है !?


याद है 
भीड़ में मुझे निहारती तुम्हारी आँखें 
नज़र चुराता हुआ मैं

 याद है 
गुलाबी चाशनी में भीगे हुए तुम्हारे होंठ 
मचलता हुआ मैं 

याद है 
तुम्हारी उलझी हुई जुल्फ़े 
उलझा हुआ सा मैं 

याद है 
तुम्हारे कोमल बदन का मर्म एहसास 
पिघला हुआ मैं 

याद है 
चुम्बक सा तुम्हारा आकर्षण
लोहा हुआ मैं 

याद है 
दो रोज़ का वो खूबसूरत सफर 
फिर तन्हा हुआ मैं 

याद है 
हाँ, मुझे सब याद है 
~ क्या तुम्हे याद है ?