वो नहीं है इसका गम न हो

वो थी ये वजह शुक्रगुज़ार होने को क्या कम है ?

दुनिया से पर्दा रोशनियों का बुझना तो नहीं

क्योंकि चिराग तो यूँ बुझाया गया है

कि सुबह होने को है।

~ रविंद्रनाथ टैगोर

Tuesday, 24 July 2018

A Dream within a Dream!

 
दिल के समंदर में 
भावनाओ की लहरे  
कागज़ की कश्ती 
जैसे तुम कोई साहिल!


कभी कभी लगता है
तुम मेरी कोई कविता तो नही 

घंटो सोचता हूँ लिखने में 
जैसे तुम्हारे बारे में सोचा करता हूँ

लफ्ज़ों को लय के धागे में पिरोता हूँ
जैसे तुम्हारे इशारों के नज़रानो से ख्वाबो की पोटली बनाता हूँ

अब मेरी कविता काल्पनिक ही तो है
तुम मेरी कही कोई ख्वाब तो नही 

डर लगता है मेरी कविताओं को कोई पढ़ ले
इसलिए डायरी में सहेज कर रखा हुआ है 

डर लगता है कि मेरी नींद टूट जाये
इसलिए तुम्हे यादों में महफ़ूज़ रखा हुआ है 

तुम्हे कविता सुनाने का खयाल भी ठीक नही लगता 

शायद तुम्हे मेरी कविता पसंद आये 
और मेरी कविता को तुम रास आओ!

Thursday, 28 December 2017

क्रांति!

बर्फ-सा जम गया है खून तेरा,
क्रांति की नदियाँ क्यों आज निकलती नहीं ?

चारदीवारी में कैद कब तब रहेगा,
तेरा बिना कोई हुकूमत कभी हिलती नहीं!

कितनी सदियों से है मुझे इंतज़ार तेरा,
तुझे है कि जन्नत से फुर्सत मिलती नहीं !

इतिहास से चर्चे तेरे सुने कई मग़र ,
मेरे अपने क़िसी किस्से से गुफ्तगू हुई ही नहीं!

हो रहा जश्न आज़ादी के नाम पे ,
इंकलाब की गोलियां क्यों आज चलती नहीं ?
 



 

Wednesday, 6 December 2017

खोया खोया चाँद!



है अँधेरा बहुत आज 
रौशनी कहीं भी नहीं 

बादलो में जा छुपा है वो कहीं 
उसे शायद मेरी खबर ही नहीं 

सदियों से लम्बी लगती ये रातें 
चंद करवटों में सिमटती ही नहीं 

आके ज़रा सी तसल्ली वो दे दे 
क्या उस खुदा को इतनी फुर्सत भी नहीं 

आवारा कब तक फिरें इन गलियों में 
मंजिलो का अब तक कोई इशारा ही नहीं 

खोया खोया  है चाँद जरूर आज 
मग़र अब हर रात अमावस्या की काली रात भी तो नहीं !



 Photograph: clicked at Khurai,MP ,India

Saturday, 25 November 2017

The one inside me!


खोज सके
वो पाताल हूँ  मैं
माप सके
वो आकाश हूँ मैं
सरहद सीमाओं से परे
हवाओं सा आज़ाद हूँ मैं!

गीता का ज्ञान
गंगा का पावन स्नान हूँ मैं
क़ुरान की तालीम
मक्का मदीना की अज़ान हूँ मैं
धर्म जात के बंधनो से परे
सबसे बड़ा विद्वान हूँ मैं!

शतरंज का मोहरा नहीं
मोहरे की चाल हूँ मैं
झुक जाये सामने जिसके हर गर्दन
वो शूरवीर तलवार हूँ मैं
वाद विवाद से परे
काल खंड का सर्वश्रेष्ठ लेखक हूँ मैं!

पर्वतो से विशाल
समंदर से गहरा
हर एक कल्पना से परे
अदृश्य अज्ञात अनोखा एहसास हूँ मैं!

ण में लीन
क्षण क्षण में विलीन
समय चक्र से परे
आदी और अंत का मिलाप हूँ मैं!


 Photograph: clicked at Pondicherry ,India